महावीराष्टक - स्तोत्रम्

दर्शन स्तुति

देव स्तुति

गुरुदेव स्तुति

 
 
 
 
 

गुरुदेव स्तुति

 

अहो ! जगतगुरु, देव, सुनियो अरज हमारी ।
तुम हो दीनदयालु, मैं दुखिया संसारी ॥

इस भव वन के मॉहि, काल अनादि गमयो ।
भ्रमत चहँगति माँहि, सुख नहीं दुख बहु पयो ।

कर्म महारिपु जोर, एक न काम करै जी ।
मन मान्य दुख देहि, काहूसों नाहिं डरै जी ॥

कबहूँ इतर निगोद, कबहँ, नर्क दिखावे ।
सुरनरपशुगति माहिं, बहुविधि नाच नचावे ॥

प्रभ! इनको परसंग, भव भव माहिं बुरो जी ।
जे दुख देखे देव ! तुमसों नाहिं दुरो जी ॥

एक जनम की बात, कहिना सकों सुनि स्वामी।
तुम अनन्त पर्याय, जानत अन्तरयामी ॥

मै तो एक अनाथ, ये मिलि दुष्ट घनेरे ।
कियो बहुत बेहाल, सुनियो साहिब मेरे ॥

ज्ञान महानिधि लूटि, रंक निबल करि डारयो ।
इन ही तुम मुझ माेंहिं, दिये दुख भारी ।

इनको नैक विगार, मै कछु नाहिं कियो जी ।
बिन कारण जगबन्धु ! बहुविधि बैर लियो जी ॥

अब आयो तुम पास सुनि कर सुजस तिहारो ।
नीति निपुन महाराज कीजे न्याय हमारो ॥

दुष्टन देहु निकार, साधुनको रख लीजे ।
विनवै भूधरदास हे प्रभु ! ढील न कीजे ॥