महावीराष्टक - स्तोत्रम्

दर्शन स्तुति

देव स्तुति

गुरुदेव स्तुति

 
 
 
 
 

दर्शन स्तुति

 

प्रभु पतित-पावन मैं अपावन,
चरण आयो सरन जी ।
यो विरद आप निहार स्वामी,
मेट जामन मरन जी ॥
तुम ना पिछान्याआन मान्या,
देव विविध प्रकार जी ।
या बुध्दिसेतीनिजनजान्यों ,
भ्रमगिन्योहितकार जी ॥
भव-विकट-वन में करम बैरी,
ज्ञान-धन मेरो हरयो ।
तब इष्ट भूल्योभ्रष्ट होय,
अनिष्ट - गति धरतो फिरयो ॥
धन घड़ी यों धन दिवस यों ही,
धन जनम मेरो भयो ।
अबभागमेरो उदय आयो,
दरशप्रभुजीकोलख लयो ॥
छवि वीतरागी नगन मुद्रा,
दृष्टि नासापै धरैं ॥
वसु प्रातिहार्यअनंतगुण युत,
कोटिरविछवि को हरैं ॥
मिटगयोतिमिरमिथ्यात्वमेरो,
उदयरविआतम भयो ।
मोउर हरष ऐसो भयो,
मनु रंक चिंतामणी लयो ॥
मैं हाथ जोड़ नवाय मस्तकख्
बीनउं तुव चरण जी ।
सर्वोत्कृष्ट त्रिलोकपतिजिन,
सुनहु तारनतरनजी॥
जाचूं नहीं सुरवास पुनि,
नरराज परिजन साथ जी ।
'बुध' जाचहूँतुमभक्ति
भवभव, दीजियेशिवनाथ जी ॥